मोजर बेयर पावर प्लांट में देवशरण का मौत

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मामला मध्य प्रदेश के अनूपपुर जिले में

सबसे बड़े पॉवर प्लांट हिंदुस्तान जैतहरी कि हैं जहां पर जिम्मेदार अधिकारी सिर्फ अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए आम नागरिक के जिन्दगी से जानबूझ चंद पैसा बचाकर खिलवाड़ करती हैं जिसके कारण आज एक जान फिर चली गई जिसका नाम देव शरण केवट निवासी ग्राम चांदपुर का है जो कि एक कम्पनी में खाता धारक था जिसको कम्पनी कि ओर से मिलने वाला सम्पूर्ण लाभ का हक दार था लेकिन कंपनी के प्रबंधक जो कि गैर जिम्मेदार होने के सांथ सांथ भिन्न भिन्न आरोप भी लगाए तो कम पड़ेगा जिसकी पुष्टि भी अभी हाल ही में लेबर कमिश्नर जाँच कर लेबल लगा दिए हैं कंपनी आज से नहीं बल्कि जब से कंपनी जैतहरी नगर में अपना पहला कदम रखी हैं तब से विस्थापित परिवारों का खुला शोषण कर रही हैं वो भी स्थानीय प्रशासन के भरपूर सहयोग से तो विस्थापित परिवार के प्रत्येक सदस्य न्याय कि उम्मीद किनसे करे व किस पर भरोसा करें ।

बिना सेफ्टी के बालकनी में काम कर रहा कर्मचारी कि गई जान

जंहा एक ओर बडी बडी कंपनी सब से पहले अपने वर्करों कि सेफ्टी को ज्यादा ध्यान देती हैं तो वंही पर हिंदुस्तान पॉवर सिर्फ अपना स्वार्थ सिद्ध करना जानती हैं जिसका जीता जागता स्पस्ट उदाहरण हैं आज का घटना जिसमे देव शरण केवट का जान चला गया कंपनी को यह भली भांति ज्ञात हैं कि जमीन से तीन फिट के ऊपर से ज्यादा का हाइट से रेक्शन व कम्पनी अधिनियम के तहत रिक्स में आता हैं जंहा पर विशेष प्रकार के सेफ्टी का प्रावधान होता हैं फिर भी कंपनी के जिम्मेदार प्रत्येक अधिकारियों के द्वारा घोर लापरवाही दिखा कर एक गरीब व्यक्ति का जान लेकर गैर इरादतन हत्या कर देव शरण केवट के परिवार को दर बदर भटकने पर मजबूर कर दिए हैं जिस पर प्रशासन का कोई विषेस सहयोग दिखाई नहीं दे रहा अभी फिलहाल ।

विस्थापित भूमि के सदस्य का जान जाने का जिम्मे लेने के लिए कम्पनी व स्थानीय प्रशासन तैयार नहीं

जिस प्रकार आज से लगभग 17 वर्ष पूर्व सम्पूर्ण जिला का शासन और प्रशासन दोनों मिलकर किसानों कि बहुमूल्य भूमि को कम्पनी को देने के लिए मजबूर कर बड़ी ही तत्परता से भूमि को अधिग्रहण करवा दिए थे उसी प्रकार आज प्रशासन किसानों को उनके हक का मिलने वाला सम्पूर्ण लाभ को दिलवाने में पूर्ण रूप से अशफल है जिससे किसान न चाहते हुए भी ठेका समिति पर कार्य करने के लिए मजबूर व विवश हैं और किसानों के सांथ यदि किसी भी प्रकार का कोई भी दुर्घटना होता हैं तो कंपनी प्रबंधक हमेशा कि तरह अपने गले कि फास को या फिर ये कहा जाय कि अपने मूड कि बिछी दूसरे के मूड़ के ऊपर डालती हैं हमेसा निकालने का प्रयास करती हैं न कि किसानों के हित में कार्य करती हैं ।

जिम्मेदार अधिकारी छाड़ रहे हैं अपना अपना पल्ला

कंपनी प्रबंधक जब यह भली भांति जान गया कि देव शरण केवट बालकनी से गिर कर मर गया हैं जो बिना सेफ्टी का कार्य को कर रहा था तो अपने द्वारा किये गए लापरवाही को छुपाने के लिए आनन फानन में सबसे पहले डेड बॉडी को एम्बुलेंस में हास्पिटल भेज कर जिला हास्पिटल को रिफर कर दिया गया जिससे प्रशासन के आंख में यह धूल झोंक सके कि देव शरण केवट कि मृत्यु हास्पिटल में हुआ हैं और अपने द्वारा किये गए गैर इरादतन हत्या को साधारण मृत्यु का संज्ञा दे रहे हैं जो कि पूर्ण रूप से अनुचित हैं इस पर जिला प्रशासन को जिम्मेदार अधिकारी के ऊपर शक्ति के सांथ कार्यवाही करनी चाहिए ।

कम्पनी प्रबंधक मृतक के हक का सम्पूर्ण लाभ परिजनों को देंगे या फिर पूर्व में मृत देवलाल प्रजापति कि पत्नी रामकली प्रजापति के तरह दर दर भटने को मजबूर करेंगे

कंपनी के जिम्मेदार अधिकारी आनन फानन में मौखिक रूप से प्रशासन के सामने कह तो दिया कि हम कब कुछ लाभ देंगे लेकिन ऑन कैमरा जब जिम्मेदार शासन प्रशासन और कंपनी के प्रबंधक को देवलाल प्रजापति के सांथ हुई घटना का उदाहरण देकर पूछा गया तो किसी के पास कोई भी स्पस्ट जवाब नही और कंपनी का कहना है कि वो अन्य हक के लिए हाईकोर्ट गई जिससे यह भी स्पस्ट होता है कि कंपनी अपने वादे को नही निभाई हैं जिससे असहाय महिला आज भी दर बदर भटकने को मजबूर हैं और कंपनी दूर बैठ कर तमासा देख कर ताली बजा रही हैं और गलत जवाब देकर स्थानीय प्रशासन के सांथ सांथ न्यायालय को भी गुमराह कर रही हैं जिसका अभी का प्रत्यक्ष उदाहरण हैं कंपनी में कार्यरत
कर्मचारियों का पेमेंट स्लिप व ज्वायनिंग लेटर न देकर जिस पर अभी प्रशासन के द्वारा जुर्माना भी लगाया गया हैं । भारत में कार्यस्थल पर 3 फीट (या किसी भी ऊँचाई) से गिरकर कर्मचारी की मृत्यु होने पर कंपनी या नियोक्ता पर सख्त कानूनी देनदारियां आती हैं। मुख्य रूप से कर्मचारी क्षतिपूर्ति अधिनियम, 1923 (Employees’ Compensation Act, 1923) और फैक्ट्री अधिनियम, 1948 (Factories Act, 1948) लागू होते हैं।यहाँ कानूनी प्रावधान और कंपनी की जिम्मेदारियां दी गई हैं:1. नियोक्ता की कानूनी जिम्मेदारी (Employer’s Liability)काम के दौरान दुर्घटना: यदि कर्मचारी की मृत्यु नौकरी के दौरान या नौकरी के कारण होती है, तो नियोक्ता मुआवजा देने के लिए बाध्य है।दोषरहित कार्यक्रम (No-fault Liability): कर्मचारी क्षतिपूर्ति अधिनियम के तहत, यह साबित करने की आवश्यकता नहीं है कि लापरवाही किसकी थी। अगर काम करते हुए मृत्यु हुई है, तो मुआवजा देय है।सुरक्षा का कर्तव्य: फैक्ट्री एक्ट की धारा 32 और 40 के तहत, नियोक्ता को कार्यस्थल पर सुरक्षित मचान (scaffolding), रेलिंग और कार्य वातावरण प्रदान करना अनिवार्य है, खासकर ऊँचाई पर काम करते समय।2. मुआवजे की गणना (Compensation Calculation)मृतक के आश्रितों को मुआवजे की राशि कर्मचारी की उम्र और वेतन के आधार पर तय की जाती है:सूत्र: मृत कर्मचारी की मासिक मजदूरी का 50% \(\times \) प्रासंगिक कारक (Age Factor) या ₹1,20,000, जो भी अधिक हो।अतिरिक्त मुआवजा: अंतिम संस्कार के खर्च और चिकित्सा व्यय भी नियोक्ता द्वारा वहन किए जाने चाहिए।penalty: यदि मुआवजा समय पर नहीं दिया जाता है, तो नियोक्ता को ब्याज और पेनल्टी भी देनी पड़ सकती है।3. सुरक्षा नियम (Safety Regulations)3 फीट की ऊँचाई: हालांकि कई अंतरराष्ट्रीय नियम 4-6 फीट पर फॉल प्रोटेक्शन की बात करते हैं, लेकिन भारतीय कानून (Factories Act) कहता है कि अगर गिरने से गंभीर चोट का खतरा है (जैसे 3 फीट से भी नीचे खतरनाक मशीन या कंक्रीट फ्लोर पर गिरना), तो सुरक्षा उपाय (रेलिंग, नेट) जरूरी हैं।सुरक्षा उपकरण: मचान (Scaffold) या सीढ़ी पर काम करते समय सुरक्षा बेल्ट या हार्नेस प्रदान करना नियोक्ता की जिम्मेदारी है।4. अपराधिक देनदारी (Criminal Liability)यदि यह साबित होता है कि कंपनी ने जानबूझकर सुरक्षा नियमों की अनदेखी की (जैसे सुरक्षा बेल्ट न देना), तो भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 304A (लापरवाही से मौत) के तहत प्राथमिकी (FIR) दर्ज की जा सकती है।यदि कर्मचारी ESIC के अंतर्गत हैयदि कर्मचारी ESIC (Employees’ State Insurance Corporation) के तहत कवर है, तो मुआवजा और आश्रित लाभ (Dependant’s benefit) ESIC द्वारा दिया जाएगा, न कि सीधे कंपनी द्वारा।सलाह: पीड़ित परिवार को तुरंत स्थानीय लेबर कमिश्नर ऑफिस या पुलिस स्टेशन में इस दुर्घटना की रिपोर्ट करनी चाहिए।

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