अनूपपुर में न्याय की फाइलें बंद अनूपपुर में आवेदन आते ही निष्प्रभावी हो जाते हैं

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अनूपपुर।जिला अस्पताल अनूपपुर में मरीज कुसुम तिवारी के उपचार को लेकर उठा मामला अब किसी एक डॉक्टर, एक वार्ड या एक दिन की चिकित्सा प्रक्रिया तक सीमित नहीं रह गया है। यह मामला धीरे-धीरे उस पूरे प्रशासनिक और स्वास्थ्य तंत्र की परतें खोल रहा है, जिसमें शिकायत करने वाला ही कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है, और जिन पदों को आम नागरिक की आखिरी उम्मीद माना जाता है, वहां दिए गए आवेदन भी जिले की सीमा में प्रवेश करते ही बेमानी कागज बनकर रह जाते हैं।
शिकायतकर्ता अजीत तिवारी के अनुसार, वे अपनी माता को केवल कमजोरी की शिकायत के चलते ग्राम चोलना से लगभग 35 किलोमीटर दूर टू-व्हीलर से जिला अस्पताल अनूपपुर लाए थे। उस समय मरीज की स्थिति गंभीर नहीं थी, वे स्वयं चल-फिर सकती थीं। जांच के बाद बताया गया कि हीमोग्लोबिन मात्र 4 ग्राम और प्लेटलेट्स 13,000 हैं, जो अत्यंत चिंताजनक स्थिति थी इसके बाद तीन दिनों तक लगातार होल ब्लड चढ़ाया गया, लेकिन सबसे बड़ा और आज तक अनुत्तरित प्रश्न यह है कि जब प्लेटलेट्स लगातार गिर रही थीं, तब समय रहते प्लेटलेट्स ट्रांसफ्यूजन अथवा उच्च संस्थान रेफर करने की प्रक्रिया क्यों नहीं अपनाई गई?

रात में बिगड़ी हालत, न डॉक्टर… न सुविधा… न संवेदनशीलता

तीसरे यूनिट ब्लड के बाद रात में मरीज की हालत अचानक बिगड़ गई। आरोप है कि न रात में कोई डॉक्टर देखने आया, न मरीज को कंबल जैसी बुनियादी सुविधा दी गई और न ही स्थिति की गंभीरता को देखते हुए तत्काल रेफर करने की पहल की गई अगली सुबह मजबूर होकर शिकायतकर्ता ने स्वयं निर्णय लिया कि अब मरीज को शहडोल जिला अस्पताल ले जाना ही एकमात्र विकल्प है। रेफर तो किया गया, लेकिन 108 एंबुलेंस उपलब्ध नहीं कराई गई। मरीज को निजी व्यवस्था से एक कॉलेज वाहन में शहडोल के लिए रवाना होना पड़ा। रास्ते में ही उनकी हालत और बिगड़ गई।
शिकायतकर्ता का दावा है कि अनूपपुर से रवाना होते समय मरीज का हीमोग्लोबिन 6 और प्लेटलेट्स मात्र 6,000 रह गए थे। सवाल यह है कि इतनी गंभीर अवस्था में सरकारी एंबुलेंस क्यों नहीं दी गई? क्या 108 सेवा केवल फाइलों और पोस्टरों तक सीमित है?

सीएम हेल्पलाइन से मुख्यमंत्री तक… फिर भी सन्नाटा

इस पूरे मामले में शिकायतकर्ता ने सीएम हेल्पलाइन, कलेक्टर अनूपपुर, मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी, स्वास्थ्य मंत्री मध्यप्रदेश और मुख्यमंत्री मध्यप्रदेश तक को लिखित आवेदन दिए। लेकिन आरोप है कि इन सभी आवेदनों का अनूपपुर जिले में कोई प्रभाव ही नहीं पड़ा इसके विपरीत, जिला स्तर पर गठित जांच समिति ने शिकायतकर्ता को बुलाए बिना, उसका पक्ष सुने बिना और मौके की वास्तविक परिस्थितियों का परीक्षण किए बिना ही यह निष्कर्ष निकाल दिया कि मरीज के उपचार में किसी प्रकार की लापरवाही नहीं पाई गई।

इलाज की बजाय शिकायतकर्ता ही बना संदिग्ध

सबसे चौंकाने वाला पहलू यह रहा कि जांच का फोकस इलाज की गुणवत्ता और व्यवस्थागत चूक पर केंद्रित होने के बजाय, शिकायतकर्ता के कथनों को ही संदिग्ध ठहराने की दिशा में मोड़ दिया गया। बाद में गंभीर चिकित्सा शिकायत को तकनीकी तरीके से “मांग श्रेणी” में बदल दिया गया, जिससे पूरा मामला स्वतः कमजोर कर दिया गया।

प्राकृतिक न्याय का खुला उल्लंघन

कानून के जानकारों के अनुसार, किसी भी प्रशासनिक या विभागीय जांच में प्राकृतिक न्याय का सिद्धांत लागू होता है। इसका सीधा अर्थ है कि शिकायतकर्ता को सुने बिना कोई निष्कर्ष निकालना न्यायसंगत नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के अनेक निर्णयों में यह स्पष्ट किया गया है कि बिना सुनवाई के लिया गया निर्णय मनमाना होता है और यह संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन है।

इसके बावजूद अनूपपुर में जांच पूरी मानते हुए फाइल बंद करने का प्रस्ताव तैयार कर दिया गया।

यह व्यक्तिगत लड़ाई नहीं, सिस्टम का आईना है

शिकायतकर्ता का कहना है कि यह उनकी व्यक्तिगत लड़ाई नहीं है। यह उस स्वास्थ्य व्यवस्था का उदाहरण है, जहां अगर मरीज का परिजन सवाल पूछे तो उसे ही परेशानी का कारण बना दिया जाता है। उन्होंने सवाल उठाया है कि अगर यही स्थिति किसी गरीब या आदिवासी परिवार के साथ होती, जो न आवेदन लिख पाता, न अधिकारियों तक पहुंच पाता, तो उसका क्या हाल होता? अब इस पूरे प्रकरण में शिकायतकर्ता ने नई शिकायत क्रमांक 35960510 (दिनांक 21-12-2025) दर्ज कराकर स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच की मांग की है, जिसमें शिकायतकर्ता को भी जांच प्रक्रिया में शामिल किया जाए।
जब मुख्यमंत्री तक की सुनवाई जिले में आकर दम तोड़ दे, तो न्याय कहां? शिकायतकर्ता का सीधा सवाल है— जब कलेक्टर, स्वास्थ्य मंत्री और मुख्यमंत्री को दिए गए आवेदन भी जिले में आकर निष्प्रभावी हो जाएं, तो आम नागरिक के लिए न्याय का रास्ता आखिर बचता कहां है?
आज यह मामला केवल एक मरीज के इलाज का नहीं रहा, बल्कि अनूपपुर जिले की पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था की संवेदनशीलता, जवाबदेही और पारदर्शिता पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न बन चुका है।

उपस्वास्थ्य मंत्री से प्रतिक्रिया नहीं

इस पूरे मामले में उपस्वास्थ्य मंत्री से भी प्रतिक्रिया लेने का प्रयास किया गया, लेकिन खबर लिखे जाने तक उनका पक्ष सामने नहीं आ सका।

डॉ. एस. सी. राय का स्पष्ट बयान

वरिष्ठ चिकित्सा अधिकारी डॉ. एस. सी. राय ने साफ शब्दों में कहा कि उन्होंने इस मामले में कोई जांच नहीं की है उनका कहना है कि जांच समिति द्वारा उनका नाम जबरन शामिल किया गया, जबकि उन्होंने न तो किसी जांच प्रक्रिया में भाग लिया और न ही किसी निष्कर्ष पर हस्ताक्षर किए।

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