अनूपपुर/शुभ संकेत: अनूपपुर में RTI कानून की आत्मा पर प्रहार, पद की मर्यादा लांघने का आरोप। भगवद् गीता में कहा गया है- “धर्म की रक्षा करने से ही व्यवस्था टिकती है, और जब धर्म का क्षय होता है, तब अराजकता जन्म लेती है।” मध्यप्रदेश राज्य के जिला अनूपपुर में हाल ही में जारी एक शासकीय पत्र ने यही प्रश्न खड़ा कर दिया है— क्या सूचना देने की जिम्मेदारी निभाने वाले अधिकारी स्वयं ही न्याय का आसन ग्रहण कर सकते हैं? कानून की चौखट पर खड़ा सवाल
सूचना अधिकार अधिनियम, 2005 के अंतर्गत दायर एक आवेदन के जवाब में सहायक लोक सूचना अधिकारी एवं सहायक श्रम पदाधिकारी अनुव्रत देव द्विवेदी के हस्ताक्षर से जो पत्र जारी हुआ, उसमें न केवल सूचना देने से इनकार का संकेत है, बल्कि ऐसा प्रतीत होता है मानो आवेदन पर अंतिम निर्णय भी सुना दिया गया हो।
कानून के जानकारों के अनुसार—
“जहाँ केवल डाकिया बनने का दायित्व था,
वहाँ फैसले का फरमान कैसे जारी हो गया?” ‘अति उत्साह’ या ‘अधिकार का दुरुपयोग’?
RTI अधिनियम स्पष्ट कहता है:
सहायक लोक सूचना अधिकारी (APIO)
🔹 केवल आवेदन प्राप्त कर अग्रेषित करता है
🔹 न सूचना देने का अधिकार
🔹 न सूचना रोकने का
इसके बावजूद, पत्र में धारा 8(1)(j) का हवाला देकर जानकारी को “व्यक्तिगत” बताना कानून की आत्मा के विपरीत माना जा रहा है। यह स्थिति उस लोकोक्ति को चरितार्थ करती है— “न नौ मन तेल होगा, न राधा नाचेगी। फिर भी नगाड़ा पीटा जा रहा है।”
गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं—
“कर्म करो, फल का अधिकार मत चाहो।”
लेकिन यहाँ तो—
कर्म सूचना देने का था
और फल सूचना रोकने का दे दिया गया
विशेषज्ञों का कहना है कि
सरकारी कार्रवाई, शिकायत पर हुई कार्यवाही और प्रशासनिक निर्णय
को “व्यक्तिगत सूचना” बताना
गीता के उस सिद्धांत के विरुद्ध है, जिसमें
लोकहित को सर्वोपरि बताया गया है।
📢 जनता पूछ रही है — जवाब कौन देगा?
जब—
एक अधिकारी अपने वैधानिक दायरे से बाहर जाकर
कानून की ढाल लेकर
नागरिक के सूचना के अधिकार पर परदा डाले
तो सवाल उठना लाज़मी है—
“बिल्ली के गले में घंटी कौन बाँधेगा?”
और जब चुप्पी शासन की भाषा बन जाए,
तो लोकतंत्र के लिए यह
“सन्नाटे का शोर” बन जाता है।
सूत्रों के अनुसार—
इस पत्र को Ultra Vires (अधिकार क्षेत्र से बाहर) घोषित कराने की तैयारी है मामला राज्य सूचना आयोग से लेकर उच्च न्यायालय तक जा सकता है
क्योंकि—
“कानून किताब में लिखा नहीं रहता,
वह आचरण से जीवित रहता है।”
यह प्रकरण केवल एक RTI का नहीं,
बल्कि उस रेखा का है
जहाँ से आगे
प्रशासन और मनमानी में फर्क मिटने लगता है।
“जब अधर्म बढ़ता है, तब प्रश्न पूछना ही धर्म बन जाता है।”
और आज अनूपपुर में
वही प्रश्न
पूरे प्रदेश की ओर से
पूछा जा रहा है।


