रामकली प्रजापति पति स्व0 देवलाल प्रजापति सहित 57 श्रमिकों के मामले में देरी क्यों

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मज़दूरी पर डाका, पहरेदार मौन!

MB Power में श्रमिकों की कमाई लुटी, जांच फाइलों में कैद

एक सप्ताह की जांच, दो महीने की खामोशी
57 श्रमिक इंसाफ़ को तरसे, श्रम विभाग कुंभकर्णी नींद में

नया साल 2026 आ चुका है,
लेकिन अनूपपुर में श्रमिकों के जीवन की घड़ी
अब भी बीते साल की तारीख़ों में अटकी हुई है।
MB Power में कार्यरत दर्जनों श्रमिकों की मज़दूरी को लेकर
जो तस्वीर उभरकर सामने आई है,
वह सिस्टम पर सीधा सवाल खड़ा करती है—

“जब रक्षक ही मौन हों,
तो लुटेरों को डर किस बात का?”

एक हफ्ते की जांच, दो महीने का इंतज़ार
जिला प्रशासन द्वारा रामकली प्रजापति पति स्व0 देवलाल प्रजापति ग्राम गुवारी के शिकायत पत्र पर
01 सप्ताह में जांच कर प्रतिवेदन सौंपने के स्पष्ट निर्देश दिए गए थे।
इसके बाद भी जनसुनवाई में समय दोहराया गया।
लेकिन—
न जांच पूरी हुई
न रिपोर्ट बनी
न श्रमिकों को जवाब मिला

अब सवाल उठ रहा है—
क्या आदेश सिर्फ काग़ज़ के लिए होते हैं?
यह हालात उस कहावत को चरितार्थ करते हैं—

“ऊँट के मुँह में ज़ीरा।”

मज़दूर का पसीना, भुगतान गायब

श्रमिकों का आरोप है कि—
ठेकेदारों और कंपनी प्रबंधन के स्तर पर
मज़दूरी भुगतान में गंभीर अनियमितता हो रही है
लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न यह है—
श्रम विभाग के अधिकारियों की निगरानी कहाँ है?
न्यूनतम वेतन के नियम मौजूद हैं,
पे-स्लिप देना अनिवार्य है,
फिर भी—
क्या मज़दूर आज भी भगवान भरोसे है?

क्या मिलीभगत की बू आ रही है?

कंपनी में पूर्व में निरीक्षण के दौरान
“कोई समस्या नहीं” बताई जाती है,
लेकिन—
कार्यालय पहुँचते ही शिकायतों की बाढ़ आ जाती है
तो सवाल लाज़मी है—

“आंखों पर पट्टी है या ज़ुबान पर ताला?”

यही वजह है कि लोग अब यह पूछने लगे हैं—

“कहीं ऐसा तो नहीं कि
बिल्ली के गले में घंटी बाँधने वाला कोई नहीं?”

सामाजिक कार्यकर्ता एवं अध्यक्ष भूमि विस्थापित किसान, कर्मचारी संघ की लगातार पहल पर कलेक्टर की सख़्ती से पहले भी हुआ भुगतान
याद दिलाना ज़रूरी है कि—
पूर्व में जब एम बी पावर कंपप्रजापति सहित 57 श्रमिआवेदिका रामकली प्रजापति पति स्व0 देवलाल प्रजापति सहित 57 श्रमिकों के मामले में देरी क्यों ?

शासन बदनाम, जिम्मेदार अधिकारी बेपरवाह?
राज्य स्तर से
न्यूनतम वेतन को लेकर
लगातार दिशा-निर्देश जारी होते हैं।
फिर भी ज़मीनी अमल न होना
यह सवाल खड़ा करता है—

“क्या अधिकारी शासन की साख से खेल रहे हैं?”

यह वही स्थिति है जहाँ कहा जाता है—
“घर की आग, लंका जला दे।”
इंतज़ार में इंसाफ
57 से अधिक श्रमिक आज भी टकटकी लगाए बैठे हैं—
जांच रिपोर्ट कब बनेगी?

अंतर बकाया की राशि कब मिलेगा?

दोषी पर कार्रवाई कब होगी?

सवाल सीधा है—
“क्या न्याय की रफ्तार
मज़दूर/श्रमिक की भूख से भी धीमी हो गई है?”

जांच रिपोर्ट अब तक क्यों नहीं?

न्यूनतम वेतन का पालन क्यों नहीं?

पे-स्लिप क्यों नहीं दी जा रही?

क्या श्रम विभाग के जिम्मेदार अधिकारी अपनी जिम्मेदारी निभा रहा है?

कलेक्टर को रिपोर्ट कब मिलेगी।

यह जिम्मेदारी निभाने की आख़िरी चेतावनी है।
क्योंकि—
जब मज़दूर की मज़दूरी लुटती है,
तो सवाल सिर्फ कंपनी पर नहीं,
पूरे सिस्टम पर उठते हैं।
अब देखना यह है—
क्या नकेल कसी जाएगी?
या फिर यह आग और भड़केगी?

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