आदेश की अवहेलना या मिलीभगत? अनूपपुर में श्रम जांच पर उठे गंभीर सवाल”*

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अनूपपुर/इंदौर।
मध्यप्रदेश शासन के श्रमायुक्त कार्यालय, इंदौर द्वारा जारी स्पष्ट निर्देशों के बावजूद अनूपपुर जिले में एक गंभीर श्रमिक शिकायत की जांच आज तक अधूरी पड़ी है। *मामला एम.बी. पावर (म.प्र.) लिमिटेड, लहरपुर* से जुड़ा है, जहाँ एक प्रभावित श्रमिक रमेश प्रजापति द्वारा कंपनी प्रबंधन पर जानबूझकर भेदभाव एवं आर्थिक शोषण के आरोप लगाए गए थे।

7 दिन का निर्देश, 60 दिन से ज्यादा का इंतज़ार
दिनांक 01.12.2025 को श्रमायुक्त कार्यालय, इंदौर द्वारा सहायक श्रम पदाधिकारी अनुव्रत देव द्विवेदी, अनूपपुर को स्पष्ट निर्देश दिया गया था कि शिकायत में वर्णित सभी तथ्यों/बिंदुओं की जांच कर 7 दिवस के भीतर प्रतिवेदन प्रस्तुत करें।
किन्तु निर्धारित समय सीमा बीत जाने के बावजूद न तो जांच की कार्यवाही हुई और न ही श्रमिक को किसी प्रकार की सूचना दी गई।
स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि 05.02.2026 को उप श्रमायुक्त (प्रवर्तन) को “स्मरण पत्र” जारी करना पड़ा, जो स्वयं इस बात का प्रमाण है कि मूल आदेश का पालन नहीं हुआ।

प्रशासनिक शिथिलता या संरक्षण?

स्थानीय श्रमिकों में यह चर्चा जोरों पर है कि आखिर सहायक श्रम पदाधिकारी अनुव्रत देव द्विवेदी द्वारा आदेश की अनदेखी क्यों की गई?
क्या कंपनी प्रबंधन के विरुद्ध कठोर कार्रवाई से बचने के लिए जांच को लंबित रखा गया?

क्या शासन के निर्देशों से ऊपर किसी अन्य हित का संरक्षण किया जा रहा है?

यदि किसी अधिकारी द्वारा वरिष्ठ अधिकारी के वैधानिक आदेश का पालन नहीं किया जाता, तो यह मध्यप्रदेश सिविल सेवा (आचरण) नियम एवं प्रशासनिक अनुशासन का गंभीर उल्लंघन माना जाता है।

श्रमिकों का आरोप – “जांच से पहले ही रिपोर्ट?”

शिकायतकर्ता एवं प्रभावित परिवारों का आरोप है कि उन्हें न तो जांच की तिथि की जानकारी दी गई और न ही उनका पक्ष दर्ज किया गया। आशंका यह भी जताई जा रही है कि बिना स्थल निरीक्षण एवं श्रमिक बयान के प्रतिवेदन भेजा जा सकता है, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत होगा।

पहले ऐसी स्थिति नहीं थी

स्थानीय स्तर पर यह भी कहा जा रहा है कि पूर्व में जिले की श्रम व्यवस्था सक्रिय और जवाबदेह थी, किन्तु हालिया समय में शिकायतों पर कार्रवाई में उल्लेखनीय शिथिलता देखी गई है।

अब नजरें इंदौर पर

चूंकि स्मरण पत्र जारी हो चुका है, अब यह देखना होगा कि सहायक श्रम पदाधिकारी अनुव्रत देव द्विवेदी नियमानुसार जांच कर पारदर्शी प्रतिवेदन भेजते हैं या नहीं। यदि आदेश की अवहेलना सिद्ध होती है, तो शासन स्तर पर विभागीय जांच, निलंबन अथवा अनुशासनात्मक कार्रवाई की मांग तेज हो सकती है।

श्रम विभाग का दायित्व केवल पत्राचार तक सीमित नहीं, बल्कि श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करना है। यदि उच्चाधिकारी के आदेश भी जमीन पर लागू न हों, तो व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न स्वाभाविक है। शासन को चाहिए कि इस प्रकरण में पारदर्शिता लाते हुए समयबद्ध जांच सुनिश्चित करे।

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