फाइलों की स्पीड 2G, जवाब 5G… न्याय अभी भी ‘लोडिंग’ में!”* रामकली की फाइल: तारीख पे तारीख… और जांच अभी बाकी!

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शहडोल भोपाल । शुभ संकेत: मध्यप्रदेश के आधुनिक युग में जहां डिजिटल इंडिया, स्मार्ट गवर्नेंस और त्वरित न्याय की बातें मंचों पर गूंजती हैं, वहीं शहडोल-अनूपपुर की धरती पर एक मृत श्रमिक देवलाल प्रजापति की धर्म पत्नी रामकली प्रजापति की शिकायत “लेट-लतीफा विभाग” की फाइलों में जिम्नास्टिक करती नजर आ रही है।

📅 18.12.2025 – सहायक श्रम आयुक्त शहडोल द्वारा M.B. Power MP Limited को नोटिस जारी।

📅 24.12.2025 – दस्तावेज सहित उपस्थित होने का निर्देश।

👉 कंपनी नदारद!

📅 30.12.2025 – स्मरण पत्र जारी।

📅 06.01.2026 – AVP मानव संसाधन आर.के. खताना उपस्थित, जवाब दायर।

और अब…

📅 08.02.2026 – जनता पूछ रही है: “जांच कहाँ है?”

“कॉर्पोरेट बनाम कार्यालय” – किसका पलड़ा भारी?

कंपनी का जवाब आया… मगर गोल-मटोल!
जैसे स्कूल में बच्चा बोले – “सर, होमवर्क किया था… बस कॉपी घर रह गई।”

अब सवाल उठते हैं:

क्या जवाब दाखिल होते ही फाइल को आराम दे दिया गया?

क्या जांच की समयसीमा केवल कागज पर होती है?

क्या कॉर्पोरेट प्रतिनिधि सरकारी तंत्र से भी ‘ऊपर’ हैं?

क्या श्रमिक की सुनवाई के लिए उसे 56 दिन, 86 दिन या 106 दिन का इंतजार करना होगा?

भाजपा सरकार में यह सुस्ती क्यों?

राज्य सरकार लगातार “गुड गवर्नेंस” का दावा करती है।
लेकिन यदि एक मृत श्रमिक देवलाल प्रजापति की कानूनी उत्तराधिकारी पत्नी रामकली प्रजापति को अपनी किए गए शिकायत पर कार्रवाई के लिए महीनों इंतजार करना पड़े, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।

क्या अधिकारी “मर्ज़ी के मालिक” बन बैठे हैं?

या फिर सिस्टम में कहीं ऐसी ढील है जो कॉर्पोरेट की “VIP एंट्री” को प्राथमिकता देती है?

जिम्मेदारी किसकी?

कानून कहता है कि श्रमिक शिकायतों पर त्वरित जांच और निष्पक्ष निर्णय होना चाहिए।
लेकिन यहां तो नोटिस, स्मरण पत्र, जवाब… और फिर सन्नाटा!
उच्च अधिकारियों की जिम्मेदारी बनती है कि—

जांच की समयसीमा तय कर सार्वजनिक की जाए।

देरी के कारणों की समीक्षा हो।

संबंधित अधिकारी से स्पष्टीकरण लिया जाए।

श्रमिक को प्रत्येक चरण की सूचना दी जाए।

जनता की आवाज

“क्या न्याय भी अब अपॉइंटमेंट लेकर मिलेगा?”
“क्या कॉर्पोरेट के आगे श्रमिक की आवाज धीमी पड़ जाती है?”
“क्या सरकारी आदेश केवल फाइलों की शोभा बढ़ाने के लिए होते हैं?”

अंतिम सवाल
जब 18 दिसंबर को नोटिस जारी हुआ,

24 दिसंबर को अनुपस्थिति हुई,

30 दिसंबर को स्मरण पत्र गया,

6 जनवरी को जवाब आया…

तो 8 फरवरी तक जांच का क्या हुआ?

क्या फाइल अभी भी ‘विचाराधीन’ की निद्रा में है?
या फिर कोई अदृश्य शक्ति उसे रोक रही है?

*अब निगाहें श्रमायुक्त इंदौर पर टिकी हैं।*

क्या वे इस प्रकरण को गंभीरता से लेकर जांच की गाड़ी को फास्ट ट्रैक पर डालेंगे?

या यह मामला भी सरकारी अलमारी की किसी धूल भरी शेल्फ पर “लंबित” लिखा रह जाएगा?

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