कलेक्टर के आदेश हवा में, ज़मीन पर कंपनी की मनमानी — 57 कर्मचारी आज भी न्याय को तरस रहे…
अनूपपुर/शुभ संकेत: जिले में इन दिनों एक सवाल आम हो चला है—“जब जिम्मेदारी निभाने वाला ही आँख मूँद ले, तो अन्याय की नींव क्यों न मजबूत होगी?” कलेक्टर एवं जिलादंडाधिकारी श्री हर्षल पंचोली तथा अपर कलेक्टर श्रीमती अर्चना कुमारी जी के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद,
सहायक श्रम अधिकारी अनूपपुर अनुव्रत देव द्विवेदी द्वारा न तो समय-सीमा में जांच की गई, न ही प्रतिवेदन प्रस्तुत किया गया।
नतीजा यह कि कंपनी प्रबंधन बेखौफ है और श्रमिक दर-दर भटकने को मजबूर।
दफ्तर में फाइलें चलती रहीं, फैक्ट्री में शोषण कागज़ों में सब कुछ दुरुस्त बताया गया, लेकिन ज़मीन पर तस्वीर बिल्कुल उलटी है। न्यूनतम वेतन का पालन नहीं, मासिक पे-स्लिप नहीं
बकाया भुगतान लंबित। 57 कर्मचारियों की शिकायतें जस की तस, यहाँ वही कहावत सच होती दिख रही है— “ऊँट के दाँत दिखाने के और, खाने के और।” पूर्व निरीक्षण में सब ठीक, शिकायतों में आग — यह कैसा न्याय? बताया जाता है कि जब कंपनी का निरीक्षण किया गया था, तो एक भी समस्या दर्ज नहीं हुई। लेकिन उसके बाद— श्रमिकों की शिकायतें लगातार श्रम कार्यालय पहुँचती रहीं। तो सवाल उठता है— “या तो निरीक्षण काग़ज़ी था, या शिकायतों को दबा दिया गया।” क्योंकि “जहाँ धुआँ होता है, वहाँ आग ज़रूर होती है।”
लेबर ऑफिसर की चुप्पी = कंपनी को खुली छूट
श्रमिकों का कहना है कि— कंपनी को किसी कार्रवाई का डर ही नहीं है। क्यों? क्योंकि— न नोटिस का असर, न जांच की गंभीरता, न दंड का भय, ऐसे में प्रबंधन के लिए तो यह कहावत सटीक बैठती है—”कहने को पहरा है, करने को नींद—और नतीजा यह कि खेत खाए गदहा, मार खाए जोलाहा।” पहले भी दिखी थी सख्ती, तब तुरंत झुकी थी कंपनी इतिहास गवाह है— जब पूर्व में MB Power में शटडाउन के दौरान भुगतान रोका गया था और मामला कलेक्टर महोदय तक पहुँचा—
➡️ प्रशासन ने सख्ती दिखाई
➡️ कंपनी को कार्यालय बुलाया गया
➡️ और बैठक के दौरान ही भुगतान शुरू हो गया
यानी— “डंडा दिखा तो घोड़ा सीधा चल पड़ा।” अब सवाल वही — 57 कर्मचारियों को न्याय कब? आज हालात यह हैं कि कर्मचारी रोज़ आस लगाए बैठे हैं, लेकिन जांच रिपोर्ट का अता-पता नहीं। लोग पूछ रहे हैं—“कलेक्टर के आदेशों की धज्जियाँ उड़ेंगी, तो आम आदमी किससे उम्मीद करेगा?”
“एक म्यान में दो तलवारें—अधिकारी और कंपनी, नुकसान मज़दूर का।” यह मामला साफ़ इशारा करता है कि—श्रम विभाग की निष्क्रियता ने ही कंपनी प्रबंधन को खुली छूट दे रखी है। जब तक जांच पूरी नहीं होगी रिपोर्ट कलेक्टर को नहीं पहुँचेगी और दोषियों पर कार्रवाई नहीं होगी। तब तक श्रमिकों का शोषण यूँ ही चलता रहेगा। क्योंकि— “जब तक ऊपर से सख्ती नहीं, नीचे व्यवस्था लंगड़ी ही रहेगी।”


