भूमि गई, वादे गए, लेकिन न्याय नहीं आया: 12 साल से पुनर्वास की राह देख रहा आदिवासी परिवार

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*”भूमि गई, वादे गए, लेकिन न्याय नहीं आया: 12 साल से पुनर्वास की राह देख रहा आदिवासी परिवार“*

विकास परियोजनाओं ने भर ली उड़ान, लेकिन जिनकी जमीन पर खड़ी हुईं वे आज भी अधिकारों के इंतजार में भटक रहे हैं

अनूपपुर – शहडोल।
सरकारें विकास के बड़े-बड़े दावे करती हैं, उद्योगों और परियोजनाओं को प्रदेश की प्रगति का आधार बताया जाता है, लेकिन अनूपपुर जिले में एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने विकास के मॉडल पर ही गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। जिस आदिवासी परिवार की जमीन लेकर परियोजनाओं को जमीन दी गई, वही परिवार आज भी पुनर्वास नीति के लाभों के लिए सरकारी दफ्तरों की चौखट घिसने को मजबूर है।

ग्राम मुरटोला निवासी गजराज सिंह पिता गनपत सिंह का कहना है कि उनकी भूमि का अधिग्रहण परियोजना एवं रेलवे लाइन निर्माण के लिए किया गया था। उस समय पुनर्वास नीति 2002 राष्ट्रीय पुनर्वास नीति 2007 के तहत प्रत्येक परिवार को रोजगार, और अन्य सुविधाएं देने का भरोसा दिलाया गया था। लेकिन वर्षों बाद भी वे सुविधाएं कागजों से बाहर नहीं निकल सकीं।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर जिला प्रशासन की प्राथमिकताओं में एक आदिवासी परिवार के वैधानिक अधिकारों की जगह कहां है?

यदि एक व्यक्ति कई वर्षों तक आवेदन, जनसुनवाई और अधिकारियों के चक्कर लगाता रहे और फिर भी समाधान न मिले, तो यह केवल एक व्यक्ति की पीड़ा नहीं बल्कि पूरी प्रशासनिक व्यवस्था की कार्यक्षमता पर सवाल है।

*”जनसुनवाई में सुनवाई, लेकिन समाधान गायब”*

कहा जाता है कि जनसुनवाई आम जनता को त्वरित न्याय दिलाने का माध्यम है, लेकिन इस मामले में बार-बार आवेदन देने के बाद भी नतीजा शून्य दिखाई देता है। हर बार आश्वासन मिला, हर बार समय मांगा गया, लेकिन पीड़ित परिवार के जीवन में कोई बदलाव नहीं आया।

गांव के लोगों का कहना है कि यदि वर्षों तक प्रशासन किसी वैध मांग का निराकरण नहीं कर पाता, तो आम नागरिक का व्यवस्था पर विश्वास कमजोर होना स्वाभाविक है।

*”विकास की कीमत कौन चुका रहा है?”*

परियोजनाएं शुरू हो गईं, उत्पादन शुरू हो गया, लाभ मिलने लगे, लेकिन जिस परिवार ने अपनी जमीन खोई, वह आज भी अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहा है। यह सवाल केवल गजराज सिंह और कुन्ती बाई का नहीं है, बल्कि उन तमाम विस्थापित परिवारों का है जो पुनर्वास के वादों पर भरोसा करके अपनी जमीनें छोड़ देते हैं।

*”फाइलों में कैद इंसाफ”*

यदि किसी मामले का निराकरण वर्षों तक नहीं हो पाता, तो यह केवल देरी नहीं बल्कि प्रशासनिक उदासीनता का संकेत माना जाता है। सवाल यह भी उठता है कि आखिर जिम्मेदार अधिकारी इस मामले में जवाबदेही कब तय करेंगे और पीड़ित परिवार को उसका अधिकार कब मिलेगा?

*अंतिम सवाल*

क्या आदिवासी परिवारों के अधिकार केवल सरकारी पुस्तिकाओं और नीतियों तक सीमित हैं?

क्या अनूपपुर प्रशासन के पास इस परिवार के 24 वर्षों के इंतजार का कोई जवाब है?
और यदि नहीं, तो आखिर विकास का लाभ किसके लिए और त्याग किसका?

“जमीन देने वाला आज भी इंतजार में है, और व्यवस्था अब भी जवाब तलाश रही है।”

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