🗡️ 1. महाराजा जसवंत सिंह की मृत्यु
सन् 1678 में मारवाड़ के महाराजा जसवंत सिंह की मृत्यु अफगानिस्तान के जमरूद क्षेत्र में हो गई। उनके निधन के समय उनका कोई जीवित पुत्र मारवाड़ में नहीं था।
औरंगज़ेब ने इस स्थिति का फायदा उठाकर मारवाड़ को मुगल साम्राज्य में मिलाने की कोशिश की।
लेकिन राठौड़ों ने इसे स्वीकार नहीं किया।
👶 2. अजीत सिंह का जन्म
जसवंत सिंह की मृत्यु के बाद उनकी रानियों में से एक के यहाँ अजीत सिंह का जन्म हुआ।
अजीत सिंह ही जसवंत सिंह के उत्तराधिकारी थे।
औरंगज़ेब चाहता था कि अजीत सिंह को अपने नियंत्रण में रखा जाए।
🐎 3. दुर्गादास ने अजीत सिंह को बचाया
यहीं से दुर्गादास राठौड़ की सबसे बड़ी भूमिका शुरू होती है।
दुर्गादास ने अजीत सिंह को मुगलों के हाथ लगने से बचाने का निर्णय लिया। राठौड़ योद्धाओं के साथ उन्होंने अजीत सिंह और उनकी माताओं को सुरक्षित निकालने की योजना बनाई।
मुगल सैनिकों ने उनका पीछा किया, लेकिन दुर्गादास ने बहादुरी और युद्ध-कौशल से उन्हें रोकते हुए अजीत सिंह को सुरक्षित स्थान तक पहुँचाया।
⚔️ 4. मारवाड़ की लड़ाई
इसके बाद दुर्गादास ने कई वर्षों तक मुगलों के विरुद्ध संघर्ष जारी रखा।
वे सीधे बड़े युद्धों के साथ-साथ छापामार/गुरिल्ला रणनीति का इस्तेमाल करते थे।
मुगल सेना के लिए उन्हें पकड़ना बहुत मुश्किल था।
दुर्गादास का लक्ष्य साफ था:
“अजीत सिंह को सुरक्षित रखना और मारवाड़ की स्वतंत्रता वापस दिलाना।”
👑 5. औरंगज़ेब की मृत्यु
सन् 1707 में औरंगज़ेब की मृत्यु हो गई।
इसके बाद मुगल साम्राज्य में उत्तराधिकार का संघर्ष शुरू हुआ और मुगलों की शक्ति पहले जैसी मजबूत नहीं रही।
दुर्गादास ने इस अवसर का फायदा उठाया।
🏰 6. अजीत सिंह ने मारवाड़ वापस पाया
आखिरकार अजीत सिंह ने मारवाड़ पर अपना अधिकार स्थापित किया और राठौड़ शासन फिर मजबूत हुआ।
इस पूरी लड़ाई में दुर्गादास की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण थी।
🦁 दुर्गादास की सबसे बड़ी खासियत
दुर्गादास सिर्फ एक योद्धा नहीं थे। उन्हें रणनीतिकार, स्वामीभक्त और कुशल सेनानायक के रूप में भी याद किया जाता है।
उन्होंने लगभग तीन दशक तक मारवाड़ के हितों के लिए संघर्ष किया और अजीत सिंह को बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
यही कारण है कि राजस्थान के इतिहास में दुर्गादास राठौड़ का नाम वीरता और स्वामिभक्ति के प्रतीक के रूप में लिया जाता है।
महाराजा जसवंत सिंह की मृत्यु सन् 1678 में मारवाड़ के महाराजा जसवंत सिंह की मृत्यु अफगानिस्तान के जमरूद क्षेत्र में हो गई। उनके निधन के समय उनका कोई जीवित पुत्र मारवाड़ में नहीं था। औरंगज़ेब ने इस स्थिति का फायदा उठाकर मारवाड़ को मुगल साम्राज्य में मिलाने की कोशिश की। लेकिन राठौड़ों ने इसे स्वीकार नहीं किया।
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