14 साल से पुनर्वास के लिए भटक रहा आदिवासी परिवार: कलेक्टर कार्यालय से निराश होकर कमिश्नर की चौखट पहुंचा पीड़ित

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*”14 साल से पुनर्वास के लिए भटक रहा आदिवासी परिवार: कलेक्टर कार्यालय से निराश होकर कमिश्नर की चौखट पहुंचा पीड़ित

खाता क्रमांक 17 एवं 159 के पुनर्वास लाभ आज तक अधूरे, आयुक्त ने तत्काल लिया संज्ञान, कलेक्टर को फोन कर समाधान के दिए निर्देश

शहडोल/अनूपपुर।
विकास परियोजनाओं के नाम पर भूमि अधिग्रहण करने के बाद प्रभावित परिवारों को पुनर्वास का लाभ समय पर उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी प्रशासन की होती है, लेकिन अनूपपुर जिले का एक मामला प्रशासनिक उदासीनता की कहानी बयां कर रहा है। खाता क्रमांक 17 एवं 159 से संबंधित पुनर्वास लाभों के लिए वर्षों से संघर्ष कर रहे आदिवासी किसान गजराज सिंह आखिरकार जिला प्रशासन से निराश होकर सोमवार को संभागीय आयुक्त कार्यालय शहडोल पहुंच गए।

ग्राम मुरटोला निवासी गजराज सिंह ने आयुक्त के समक्ष उपस्थित होकर बताया कि उनकी पैतृक भूमि का अधिग्रहण परियोजना एवं रेलवे लाइन निर्माण के लिए किया गया था। भूमि अधिग्रहण के समय पुनर्वास नीति 2002 के तहत रोजगार, पुनर्वास अनुदान एवं अन्य सुविधाएं देने का वादा किया गया था, लेकिन आज तक उन्हें और उनके परिवार को इन लाभों का पूर्ण रूप से लाभ नहीं मिल सका।

पीड़ित का कहना है कि वर्षों से कलेक्टर कार्यालय, एसडीएम कार्यालय और अन्य विभागों के चक्कर लगाने के बावजूद समस्या जस की तस बनी हुई है। कई आवेदन, जनसुनवाई और पत्राचार के बाद भी एम बी पावर मध्यप्रदेश लिमि0 के द्वारा बनाई गई खाता क्रमांक 17 एवं 159 के पुनर्वास संबंधी मामले का निराकरण नहीं हो सका।

कलेक्टर कार्यालय से निराश होकर पहुंचे कमिश्नर के पास
जिला स्तर पर लगातार निराशा हाथ लगने के बाद गजराज सिंह ने आज दिनांक 09 जून 2026 को स्वयं शहडोल पहुंचकर संभागीय आयुक्त के समक्ष अपनी पूरी व्यथा रखी। सूत्रों के अनुसार आयुक्त महोदय ने मामले की गंभीरता को देखते हुए तत्काल संज्ञान लिया और आवेदन की प्रति व्हाट्सएप के माध्यम से अनूपपुर कलेक्टर को प्रेषित की।
इतना ही नहीं, आयुक्त ने दूरभाष पर कलेक्टर से चर्चा कर मामले का शीघ्र परीक्षण कर समाधान सुनिश्चित करने के निर्देश भी दिए। आयुक्त की इस तत्परता ने यह स्पष्ट कर दिया कि मामला केवल एक साधारण आवेदन नहीं, बल्कि लंबे समय से लंबित एक गंभीर पुनर्वास विवाद है।

*उठ रहे हैं कई सवाल*

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जिस मामले में संभागीय स्तर पर तत्काल हस्तक्षेप की आवश्यकता महसूस हुई, उसका समाधान जिला स्तर पर वर्षों में क्यों नहीं हो सका? आखिर ऐसी कौन सी प्रशासनिक बाधा है जिसके कारण एक आदिवासी परिवार अपने वैधानिक अधिकारों के लिए दो दशक से अधिक समय तक भटकता रहा?

जब प्रभावित व्यक्ति को अपनी बात रखने के लिए सीधे संभागीय आयुक्त के समक्ष पहुंचना पड़े, तो यह स्थिति जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करती है।

आमजन के बीच यह चर्चा भी है कि यदि समय रहते उचित कार्रवाई की गई होती तो पीड़ित को शहडोल तक न्याय की गुहार लगाने नहीं जाना पड़ता।

*अब निगाहें प्रशासन पर*

आयुक्त के हस्तक्षेप के बाद अब खाता क्रमांक 17 एवं 159 से जुड़े पुनर्वास प्रकरण पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं। देखना होगा कि वर्षों से लंबित इस मामले में जिला प्रशासन कितनी गंभीरता दिखाता है और आदिवासी परिवार को उसका अधिकार कब तक मिल पाता है।

*विकास की नींव जिनकी जमीन पर रखी गई, वे आज भी अपने अधिकारों की प्रतीक्षा में हैं। अब सवाल यह है कि आयुक्त के निर्देशों के बाद क्या प्रशासन की नींद टूटेगी या फिर पुनर्वास की यह फाइल एक बार फिर सरकारी दफ्तरों की धूल फांकती रहेगी?*

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