*कलेक्टर की जनसुनवाई बनी औपचारिकता? पुनर्वास लाभ के लिए दर-दर भटक रहा आदिवासी पीड़ित गजराज सिंह, MB Power और प्रशासन पर गंभीर सवाल* 
अनूपपुर/जैतहरी।
जिले में जनसुनवाई व्यवस्था पर एक बार फिर सवाल खड़े हो रहे हैं। ग्राम लहरपुर निवासी गजराज सिंह गोंड, जो अनुसूचित जनजाति समुदाय से आते हैं, अपनी निजी भूमि के अधिग्रहण के बाद पुनर्वास लाभ पाने के लिए लगातार अधिकारियों और कार्यालयों के चक्कर काटने को मजबूर हैं।
पीड़ित का आरोप है कि कई बार आवेदन, जनसुनवाई में उपस्थिति और दस्तावेज जमा करने के बावजूद आज तक उसे उसके अधिकारों का लाभ नहीं दिया गया।
मामले में कलेक्टर कार्यालय में दर्ज जन आवेदन में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि आवेदक को पुनर्वास राशि ब्याज सहित प्रदान करने तथा अवरोध उत्पन्न करने वालों पर कार्रवाई करने की मांग की गई है। शिकायत का निराकरण समय 07 अप्रैल 2026 निर्धारित किया गया था और प्रकरण SDM जैतहरी कार्यालय को प्रेषित किया गया।
इसके बावजूद पीड़ित का कहना है कि धरातल पर कोई ठोस कार्रवाई दिखाई नहीं दे रही।
पीड़ित गजराज सिंह का कहना है कि MB Power की स्थापना और परियोजना के रेलवे लाइन निर्माण हेतु उसकी निजी भूमि के खाता क्रमांक 17 एवं 159 का अधिग्रहण किया गया, लेकिन पुनर्वास नीति के तहत मिलने वाले लाभ अब तक नहीं दिए गए। उनका कहना है कि प्रत्येक जनसुनवाई में उपस्थित होकर वे अपनी बात रख रहे हैं, परंतु प्रशासनिक स्तर पर केवल वीडियो कॉन्फ्रेंस और आश्वासनों तक ही मामला सीमित रह जाता है।
गजराज सिंह का यह भी आरोप है कि इससे पहले 20 दिसंबर 2025 को ग्राम अमगवां की जनसुनवाई में यह मामला उठाया गया था, जहां MB Power के जनसंपर्क एवं R&R प्रबंधन गौरव पाठक की ओर से कथित रूप से पारिवारिक विवाद का कारण बताकर मामले को आगे बढ़ाने से बचा गया। पीड़ित पक्ष का कहना है कि संबंधित खातों में किसी प्रकार का पारिवारिक विवाद नहीं है और आवश्यक दस्तावेज पहले ही कंपनी को जमा किए जा चुके हैं। प्रबंधन का इरादा ही नहीं है पुनर्वास लाभ देने का।
इस मामले ने कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि भूमि अधिग्रहण के समय किसानों और प्रभावित परिवारों से तत्काल भूमि ली जा सकती है, तो पुनर्वास लाभ देने में इतना लंबा समय क्यों लग रहा है? यदि सभी आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध हैं, तो आखिर बाधा कहां है?
पीड़ित परिवार के सदस्यों का कहना है,
“यदि पुनर्वास लाभ दिलाने की व्यवस्था और इच्छाशक्ति ही नहीं थी, तो हमारी निजी भूमि का अधिग्रहण कर कंपनी को क्यों सौंपा गया?”
स्थानीय लोगों में भी यह चर्चा का विषय बना हुआ है कि क्या जनसुनवाई केवल औपचारिक प्रक्रिया बनकर रह गई है, विशेषकर उन परिवारों के लिए जो उद्योग परियोजनाओं से प्रभावित हुए हैं। अब देखना होगा कि जिला प्रशासन इस मामले में वास्तविक निराकरण करता है या यह मामला भी फाइलों और आश्वासनों के बीच सीमित रह जाता है।


