
*हम हाथी हैं. इस धरती के सबसे पुराने बाशिंदे*.
*हमारे पुरखों ने ये जंगल अपने पैरों से नापा था. उन्होंने ही रास्ते बनाए, तालाब खोदे, बीज फैलाए. जहां आज आपके शहर खड़े हैं, वहां कभी हमारे जंगल थे. हम मालिक नहीं थे, बस रखवाले थे*.
*आज हम सरकार से, आपसे, हर इंसान से गुहार लगाते हैं: हमसे हमारा जंगल मत छीनो*.
*हमारी गलती क्या है?*
क्या हमारी गलती ये है कि हम बोल नहीं पाते?
आपकी भाषा में दलील नहीं दे पाते?
क्या हमारी गलती ये है कि हमारे पास वोटर कार्ड नहीं है?
क्या हमारी गलती ये है कि हम सिर्फ जीना जानते हैं, कब्ज़ा करना नहीं?
हम सुबह उठकर मंदिर नहीं जाते, हम नदी को प्रणाम करते हैं. हम कागज़ नहीं पूजते, हम पीपल के पेड़ को अपना देवता मानते हैं. क्या यही हमारा गुनाह है?
*हमसे क्या छीना जा रहा है:*
*हमारा जल*: नदियां सूख रही हैं. बांध बन रहे हैं. जो घाट पर हम सदियों से पानी पीते थे, वहां अब पाइप लगे हैं. हमारे बच्चे कीचड़ चाटने को मजबूर हैं. प्यास से तड़पकर जब वो दम तोड़ते हैं, तो कोई खबर नहीं बनती.
*हमारा जंगल*: रोज़ सुबह कुल्हाड़ी की आवाज़ से हमारी नींद खुलती है. साल के पेड़, महुआ के पेड़, बांस के झुरमुट, सब गिर रहे हैं. हमारे घर उजड़ रहे हैं. हमारा राशन, हमारी दवा, हमारी छाया, सब खत्म हो रहा है.
*हमारी ज़मीन*: जहां हमारे पुरखों की हड्डियां दफन हैं, वहां अब लोहे की मशीनें गड़ रही हैं. कोयला, लोहा, बॉक्साइट के लिए हमारी छाती चीरी जा रही है. हमें “अतिक्रमणकारी” बताया जाता है. उस ज़मीन पर जो हमारी मां है.
*जब हम मजबूर होकर निकलते हैं:*
पेट की आग हमें आपके खेतों तक ले जाती है. हम जानते हैं वो फसल आपकी मेहनत है. पर हम करें तो क्या करें? जंगल में अब कुछ नहीं बचा.
फिर आप हमें भगाने आते हैं. पटाखे, आग, गोलियां. हमारे साथ बच्चे होते हैं, बूढ़ी हथिनियां होती हैं. हम डरकर भागते हैं. कभी ट्रेन से कट जाते हैं, कभी करंट से मर जाते हैं.
अगले दिन अखबार में खबर छपती है: “हाथी के आतंक से गांव में दहशत”.
कोई ये नहीं पूछता कि हाथी गांव में क्यों आया. कोई ये नहीं लिखता कि उसका घर किसने उजाड़ा.
*हमारी आखिरी गुहार:*
हम आपसे लड़ना नहीं चाहते. हम आपके दुश्मन नहीं हैं.
हम बस उतना मांगते हैं जितना एक जीव को चाहिए: सांस लेने के लिए हवा, प्यास बुझाने के लिए पानी, सिर छुपाने के लिए जंगल.
विकास की आंधी में हमें मत उड़ा दीजिए.
आपकी तरक्की की नींव में हमारी लाशें मत दफना दीजिए.
हम बेजुबान हैं, पर बेजान नहीं. हमें भी दर्द होता है. हमें भी अपने बच्चों से मोह है. हमें भी अपना घर प्यारा है.
सरकार, सुन रही हो ना?
ये जंगल सिर्फ पेड़ नहीं, हमारी सांसें हैं.
ये ज़मीन सिर्फ मिट्टी नहीं, हमारी मां है.
इन्हें मत छीनो.
वरना कल जब ये जंगल नहीं बचेंगे, तो आपकी सांसें भी सुरक्षित नहीं रहेंगी. हम गए तो समझो आप भी गए.
हम हाथ जोड़ते हैं. हमारा जल, जंगल, ज़मीन हमें लौटा दो.


