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15 अगस्त की तीन तस्वीरें… और अनूपपुर की सरकारी व्यवस्था का आईना…. पहली तस्वीर जैतहरी नगर परिषद की है। स्वतंत्रता दिवस पर बच्चों को मिठाई बांटी जा रही है। लेकिन मिठाई लेने के लिए बच्चों में ऐसी अफरा-तफरी कि एक बच्चे के बाल तक पकड़े जाने जैसी स्थिति दिखाई दे रही
है।
दूसरी तस्वीर भी जैतहरी की है- जहाँ बूंदी के लिए बच्चों में लूट-सी मची हुई है। बच्चे हैं… उत्साह है… मिठाई है… लेकिन व्यवस्था कहाँ है?
और तीसरी तस्वीर अनूपपुर जिले के किसी अन्य गांव की है, जहाँ मध्यप्रदेश सरकार के मंत्री दिलीप जायसवाल और जिले के नवागत कलेक्टर झा साहब सरकारी स्कूल के बच्चों के साथ बैठकर भोजन करते दिखाई दे रहे हैं।
तस्वीर बहुत सुंदर है, लेकिन सवाल यह है कि तस्वीर के बाहर क्या है?
कैमरे के सामने मंत्री जी बच्चों के साथ भोजन कर रहे हैं, अधिकारी बच्चों के साथ बैठ रहे हैं- तालियाँ भी मिलेंगी, तस्वीरें भी वायरल होंगी।
लेकिन साहब… जिस सरकारी स्कूल के बच्चे के साथ बैठकर भोजन किया जा रहा है, क्या कभी उसी स्कूल की चारदीवारी के भीतर की हकीकत भी कैमरे में दिखाई जाएगी?
क्या देखा जाएगा कि इन बच्चों को साल के बाकी 364 दिनों में कैसी शिक्षा मिल रही है?
स्कूलों में पर्याप्त शिक्षक हैं या नहीं?
भवन और शौचालयों की स्थिति कैसी है?
बच्चों को पढ़ने का वास्तविक वातावरण मिल रहा है या नहीं?10:11 AM
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और सबसे महत्वपूर्ण-क्या गरीब के बच्चे को भी वही सम्मान मिल रहा है, जिसका अधिकारी और जनप्रतिनिधि मंचों पर भाषण देते हैं?
15 अगस्त पर एक दिन बच्चों के साथ बैठकर भोजन करना अच्छी पहल है लेकिन बच्चों के भविष्य के साथ पूरे साल बैठकर काम करना उससे कहीं बड़ी जिम्मेदारी है।
क्योंकि फोटो में बच्चा मुस्कुरा सकता है, लेकिन उसकी जिंदगी की हकीकत कैमरे से नहीं छिपती जैतहरी की ये तस्वीरें किसी एक कर्मचारी या अधिकारी को कटघरे में खड़ा करने के लिए नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था से सवाल पूछने के लिए पर्याप्त हैं।
हमारे सरकारी स्कूलों के बच्चे फोटो सेशन के पात्र नहीं, भविष्य के नागरिक हैं। उन्हें मिठाई के लिए धक्के नहीं, सम्मान चाहिए उन्हें मंच पर जगह नहीं, अच्छी शिक्षा चाहिए। उन्हें एक दिन का भोजन नहीं, पूरे साल बेहतर भविष्य चाहिए।
जनप्रतिनिधि और अधिकारी एक दिन कैमरे के सामने बैठकर भोजन करने के बजाय कभी बिना कैमरे के सरकारी स्कूलों में बैठें… बच्चों से पूछें कि उन्हें वास्तव में क्या चाहिए।
शायद तब 15 अगस्त की तस्वीर सिर्फ सुंदर नहीं, सार्थक भी होगी।
क्योंकि सवाल यह नहीं कि 15 अगस्त को बच्चों के साथ कौन बैठा था… सवाल यह है कि 16 अगस्त से 14 अगस्त तक इन बच्चों के लिए कौन खड़ा रहेग 




