*”धरती गई पटरियों के नाम, पुनर्वास अब भी इंतज़ार के धाम”*

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*”धरती गई पटरियों के नाम, पुनर्वास अब भी इंतज़ार के धाम”*

*अनूपपुर/भोपाल।* मध्यप्रदेश में विकास परियोजनाओं के नाम पर अधिग्रहित की गई जमीनों के बदले प्रभावित परिवारों को पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन लाभ दिलाने के सरकारी दावों पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। अनूपपुर जिले के जैतहरी क्षेत्र अंतर्गत ग्राम लहरपुर मुर्रा टोला की एक आदिवासी महिला श्री मति कुन्ती बाई सिंह ने कलेक्टर को आवेदन देकर आरोप लगाया है कि एमबी पावर मध्यप्रदेश लिमिटेड जैतहरी जिला अनूपपुर की रेल लाइन एवं परियोजना स्थापना के लिए उसकी पैतृक भूमि अधिग्रहित कर ली गई, जिसका खाता क्रमांक 17 एवं 159 है, लेकिन 12 वर्षों बाद भी पुनर्वास नीति के तहत मिलने वाले लाभ नहीं दिए गए। आवेदन में स्पष्ट लेख है कि भूमि जाने के बाद परिवार की आजीविका, आर्थिक स्थिति और सामाजिक सुरक्षा पर सीधा असर पड़ा है।

आवेदिका श्री मति कुन्ती बाई का आरोप है कि कंपनी के मानव संसाधन प्रमुख आर के खटाना, आर एंड आर एवं पीआरओ गौरव पाठक और जिम्मेदार अधिकारियों के समक्ष कई बार गुहार लगाने के बावजूद अभी तक कुछ भी लाभ प्रदाय नहीं किया गया, जबकि जमीन खो चुके परिवार आज भी राहत की बाट जोह रहे हैं। आवेदन में पुनर्वास नीति 2002 के अंतर्गत उपलब्ध विभिन्न सुविधाओं का हवाला देते हुए तत्काल लाभ दिलाने की मांग की गई है।

मध्यप्रदेश की पुनर्वास नीति का उद्देश्य प्रभावित परिवारों को उनके पूर्व जीवन स्तर तक पहुंचाना तथा बेहतर पुनर्स्थापन सुनिश्चित करना माना गया है।

*“विकास की रेल दौड़ी, लेकिन पुनर्वास पटरी से उतर गया?”*

क्षेत्र में अब यह चर्चा तेज हो गई है कि यदि परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया पूरी हो सकती है तो पुनर्वास की प्रक्रिया वर्षों तक अधर में क्यों लटकी रहती है। स्थानीय लोगों का कहना है कि “जब खेत गया, तब फाइलें दौड़ीं; अब अधिकार मांगने पर फाइलों को जैसे लकवा मार गया है।”

आदिवासी परिवारों से जुड़े मामलों में पुनर्वास केवल प्रशासनिक औपचारिकता नहीं बल्कि संवैधानिक और मानवीय दायित्व भी माना जाता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि भूमि अधिग्रहण के बाद प्रभावित परिवारों को पुनर्स्थापन लाभ समय पर न मिलना भविष्य में बड़े सामाजिक विवादों को जन्म दे सकता है।

*कलेक्टर से आवेदन में मांग की गई है कि—*
पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन नीति 2002 के तहत लाभ तत्काल प्रदान किए जाएं।

कंपनी प्रबंधन की भूमिका की जांच कर जिम्मेदारी तय की जाए।

लंबे समय तक लाभ न मिलने से हुए नुकसान का आकलन कर क्षतिपूर्ति दिलाई जाए।

प्रभावित परिवार को न्याय दिलाने हेतु समयबद्ध कार्रवाई की जाए।

*चर्चा में कुछ तीखे सवाल*

क्या विकास परियोजनाओं में जमीन देने वाले परिवार केवल आंकड़ों का हिस्सा बनकर रह गए हैं?

क्या पुनर्वास नीति कागजों तक सीमित होकर रह गई है?

क्या आदिवासी परिवारों की आवाज प्रशासनिक गलियारों तक पहुंचते-पहुंचते दम तोड़ देती है?

*“हक की फाइल धूल खाती रही और उम्मीद का दिया टिमटिमाता रहा।”*

*“जमीन गई तो मशीनें दौड़ पड़ीं, अधिकार मांगने पर व्यवस्था की चाल बैलगाड़ी से भी धीमी हो गई।”*

“यदि पुनर्वास नहीं, तो विकास का दावा अधूरा है; क्योंकि कहते है न कि उजड़े घरों की आह अक्सर बड़ी परियोजनाओं की चमक पर भारी पड़ जाती है।”

*”परियोजना हुई जवान, पुनर्वास हुआ बेनाम”*

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