महेश प्रजापति जिला ब्यूरो
_रोजगार की अर्जी लेकर जैतहरी पहुंचे 3 हाथी, स्थानीय युवा बोले – “अब डिग्री नहीं, सूंड चलेगी”_
*जैतहरी, अनूपपुर*
पिछले एक दिन से मोजर बेयर पावर प्लांट, जैतहरी के मेन गेट के पास सुबह-सुबह एक अजीब सी भीड़ लग रही है। न कोई बेरोजगार युवा, कोई ठेकेदार। भीड़ है तीन हाथियों की
चश्मदीदों के मुताबिक ये हाथी रोज 9 बजे प्लांट के गेट पर आकर खड़े हो जाते हैं। मानो अटेंडेंस लगाने आए हों। और गांव वाले भी अब मानने लगे हैं – “ये इंटरव्यू देने ही आए हैं”।
*HR की नई योग्यता लिस्ट वायरल*
*”पद: सुरक्षा, निगरानी, पर्यावरण संतुलन – कुल 3 पद रिक्त। योग्यता: 1. इस जमीन पर सबसे पहले आपका हक हो 2. आपका घर उजड़ चुका हो 3. आप बगैर सैलरी के भी 24 घंटे काम कर सकें। अनुभव: जंगल उजाड़ना अनिवार्य”*
*”हमारे पास डिग्री थी, उनके पास दस्तावेज है”*
जैतहरी युवा बेरोजगार संघ के अध्यक्ष
“2008 में जब प्लांट लगा था तब कहा गया था 70% स्थानीय लोगों को नौकरी मिलेगी। हमने ITI की, डिप्लोमा किया, फॉर्म भरे। 15 साल से अधिक हो गए। आज भी संविदा पर बाहर के लोग काम कर रहे हैं।
अब ये हाथी आ गए हैं। इनके पास न डिग्री है न मार्कशीट। पर इनके पास ‘भू-स्वामित्व प्रमाण पत्र’ है। ये इसी जंगल के मालिक थे। शायद HR को अब यही चाहिए।”
*प्लांट प्रबंधन: “हम पर्यावरण अनुकूल भर्ती कर रहे हैं”*
जब इस बारे में प्लांट के एक अधिकारी से पूछा गया तो उन्होंने कैमरे पर तो कुछ नहीं कहा। ऑफ रिकॉर्ड सिर्फ इतना बोले, “हम कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी के तहत पर्यावरण अनुकूल काम कर रहे हैं। वन्यजीवों के लिए कॉरिडोर बनाने पर विचार चल रहा है।”
पर गांव वाले पूछते हैं – “कॉरिडोर तब याद आया जब जंगल ही नहीं बचा?”
*इतिहास गवाह है: पहले जंगल गया, फिर पानी, अब बारी किसकी?*
मोजर बेयर प्लांट के लिए 2008-2009 में जैतहरी के आसपास 300 हेक्टेयर से ज्यादा जंगल साफ किया गया था। सैकड़ों आदिवासी परिवार विस्थापित हुए। नदी का पानी डायवर्ट हुआ।
“ये हाथियों का पुराना रास्ता था। बांधनगढ़ से अमरकंटक जाने का। प्लांट बनने के बाद रास्ता टूट गया। अब ये भटकते-भटकते वापस अपने घर की तलाश में आए हैं। बस फर्क इतना है कि घर की जगह अब फैक्ट्री की दीवार खड़ी है।”
*गांव में चर्चा: “मालिक लौट आए हैं”*
चाय की दुकान पर बुजुर्ग रामदयाल काका बोले,
“बेटा सच तो ये है। जब जंगल जाएगा, पानी जाएगा, जमीन जाएगी… तो मालिक भी वहीं लौटकर आएंगे। पहले वो पेड़ पर रहते थे। अब गेट पर खड़े हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले वो जंगल बचाते थे, अब शायद नौकरी मांगने आए हैं।”
एक महिला ने तंज कसा, “सरकार बोलती है बेटी बचाओ। हम बोलते हैं जंगल बचाओ। पर जब जंगल ही नहीं बचेगा तो बेटी किस छांव में खेलेगी? और बेटे को नौकरी कौन देगा?”
*अंत में सवाल वही*
फिलहाल HR ने न कोई जवाब दिया है, न कोई जॉइनिंग लेटर। हाथी भी रोज आकर गेट देखकर वापस जंगल की तरफ चले जाते हैं।
पर जैतहरी ने एक बात तय कर ली है – अगर योग्यता “इस मिट्टी का वारिस होना” है, तो लिस्ट में सबसे ऊपर नाम हाथियों का ही आएगा। इंसानों का नंबर… पता नहीं कब आएगा।
*रिपोर्ट: []*
*जैतहरी, अनूपपुर*


