- अभी तो यह शुरुआत है पिक्चर अभी बाकी है नगर परिषद जैतहरी में हुए भिन्न-भिन्न अनियमिताओं की सीबीआई जांच होना बहुत ही जरूरी
- सीबीआई जांच से खुलेंगे करोड़ो के गबन के राज जिससे गिरेगी और भी कर्मचारियों के ऊपर गाज
- भिन्न-भिन्न योजनाओं की होनी चाहिए पृथक पृथक जांच
नियमों की अनदेखी करने पर रोकी गईं दो वेतनवृद्धियां
शासकीय भूमि के अवैध प्रबंधन पर बड़ी प्रशासनिक चोट:
जैतहरी के प्रभारी सीएमओ पर लोकायुक्त की जांच के बाद नगरीय प्रशासन विभाग का चला हंटर
अनुपपुर /अनूपपुर जिले के अंतर्गत आने वाली नगर परिषद जैतहरी में शासकीय भूमि और उससे होने वाली आय के प्रबंधन में गंभीर वित्तीय अनियमितता और नियमों की अनदेखी का एक बड़ा मामला सामने आया है। इस मामले में संचालनालय नगरीय प्रशासन एवं विकास, मध्यप्रदेश द्वारा कड़ा रुख अपनाते हुए जैतहरी के प्रभारी मुख्य नगरपालिका अधिकारी (प्रभारी सीएमओ) एवं राजस्व उप निरीक्षक भूपेन्द्र सिंह के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की गई है। विभाग ने जांच में दोषी पाए जाने के बाद श्री सिंह की आगामी दो वेतनवृद्धियां संचयी प्रभाव से रोकने का आदेश जारी कर दिया है। यह कार्रवाई लोकायुक्त कार्यालय में दर्ज शिकायत और उसके बाद हुई लंबी विभागीय जांच के निष्कर्षों के आधार पर की गई है।
लोकायुक्त में शिकायत से शुरू हुआ मामला
इस पूरे प्रशासनिक घटनाक्रम की शुरुआत लोकायुक्त कार्यालय, भोपाल में दर्ज कराई गई एक शिकायत से हुई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि नगर परिषद जैतहरी में शासकीय उत्कृष्ट उच्चतर माध्यमिक विद्यालय की भूमि और उससे होने वाली आय को हड़पने की नीयत से गंभीर अनियमितताएं की जा रही हैं। लोकायुक्त कार्यालय ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए प्रकरण क्रमांक 0082/E/2021-22 के तहत नगर परिषद जैतहरी की तत्कालीन अध्यक्ष नवरत्नी विजय शुक्ला के विरुद्ध दर्ज किया और जुलाई 2021 में नगरीय प्रशासन एवं विकास संचालनालय को पत्र भेजकर इस पर तथ्यात्मक जांच रिपोर्ट सौंपने के निर्देश दिए थे।
शासकीय स्कूल के विकास से जुड़ी थी योजना
मामले की जड़ें साल 2013 से जुड़ी हुई हैं, जब शासकीय उत्कृष्ट उच्चतर माध्यमिक विद्यालय की शाला प्रबंधन एवं विकास समिति (S.M.D.C.) की विशेष बैठक में यह प्रस्ताव पास हुआ था कि स्कूल की खाली पड़ी जमीन पर दुकानों का निर्माण कराया जाए। इसका उद्देश्य स्थानीय बेरोजगारों को रोजगार देना, शहर की सुंदरता बढ़ाना और दुकानों के किराए से होने वाली आय को स्कूल प्रबंधन के विकास कोष में जमा कर लाभ अर्जित करना था। इसी क्रम में नगर परिषद ने भी अगस्त 2013 में संकल्प क्रमांक 53 पारित कर अपने खर्च पर बोर्डिंग भवन की भूमि पर शॉपिंग कॉम्प्लेक्स बनाने और आवंटन के बाद पूरी संपत्ति व मासिक किराए की वसूली का अधिकार स्कूल को सौंपने का निर्णय लिया था।
दुकानों की नीलामी और लाखों की हेराफेरी
प्रस्तावों के बाद तकनीकी स्वीकृति लेकर तत्कालीन ठेकेदार के माध्यम से लगभग 8.26 लाख रुपये की लागत से कॉम्प्लेक्स की कुल 8 दुकानों का निर्माण पूरा कराया गया। इसके बाद नियमानुसार आरक्षण प्रक्रिया अपनाकर साल 2019 में तत्कालीन कलेक्टर अनूपपुर के आदेशानुसार इन दुकानों की नीलामी आयोजित की गई। इस पूरी नीलामी प्रक्रिया से नगर परिषद को कुल 34,96,000 रुपये (चौंतीस लाख छियानवे हजार रुपये) की राशि प्राप्त हुई। नियमों के मुताबिक, परिषद को अपनी निर्माण लागत को समायोजित करने के बाद शेष पूरी राशि और दुकानों से मिलने वाला मासिक किराया स्कूल प्रबंधन के खाते में जमा करना था।
सीएमओ के कार्यकाल में नियमों की धज्जियां उड़ीं
विभागीय जांच में यह बात पूरी तरह साबित हुई है कि भूपेन्द्र सिंह के कार्यकाल के दौरान इस प्राप्त राशि (34.96 लाख रुपये) को स्कूल प्रबंधन कोष में ट्रांसफर करने के बजाय सीधे निकाय कोष (नगर परिषद) के खाते में जमा कर लिया गया। यही नहीं, दुकानों से वसूला गया कुल 74,200 रुपये का किराया भी स्कूल को सौंपने के बजाय नगर परिषद द्वारा खुद ही वसूला जाता रहा, जो कि सीधे तौर पर शाला प्रबंधन के अधिकारों का हनन और वरिष्ठ कार्यालयों के आदेशों का उल्लंघन था।
ई-निविदा नियमों का उल्लंघन और मनमानी
वित्तीय हेराफेरी के अलावा, प्रभारी सीएमओ पर प्रशासनिक नियमों के उल्लंघन का भी बड़ा दोष सिद्ध हुआ है। नीलामी के दौरान दुकान क्रमांक 6 के मूल बोलीदाता द्वारा राशि जमा न करने पर उसकी जमानत राशि राजसात कर ली गई थी, जिसके बाद उस दुकान की पुनर्नीलामी की जानी थी। मध्यप्रदेश नगरपालिका (अचल संपत्ति का अंतरण) नियम, 2016 के नियम 3 के तहत यह पुनर्नीलामी अनिवार्य रूप से ‘ई-निविदा’ के माध्यम से पारदर्शी तरीके से की जानी चाहिए थी। लेकिन भूपेन्द्र सिंह ने ई-निविदा प्रक्रिया को दरकिनार करते हुए मनमाने ढंग से ऑफलाइन स्तर पर ही यह नीलामी कर दी, जिससे शासन के पारदर्शी नियमों की धज्जियां उड़ीं।
लंबी जांच के बाद आरोपों की पुष्टि
लोकायुक्त के निर्देश पर संयुक्त संचालक, नगरीय प्रशासन एवं विकास, संभाग-शहडोल को इस पूरे मामले की जांच सौंपी गई थी। संयुक्त संचालक द्वारा प्रस्तुत तथ्यात्मक रिपोर्ट के बाद अप्रैल 2024 में श्री सिंह को आरोप पत्र जारी कर जवाब मांगा गया था। श्री सिंह द्वारा मई 2024 में प्रस्तुत किया गया प्रतिवाद उत्तर विभाग को संतोषजनक नहीं लगा। इसके बाद अगस्त 2024 में उनके खिलाफ औपचारिक विभागीय जांच संस्थित की गई, जिसमें संयुक्त संचालक शहडोल को जांचकर्ता अधिकारी और सीएमओ अनूपपुर को प्रस्तुतकर्ता अधिकारी नियुक्त किया गया। मई 2025 में सौंपी गई अंतिम जांच रिपोर्ट में श्री सिंह पर लगे सभी आरोप पूरी तरह प्रमाणित पाए गए।
सुनवाई में नहीं दे पाए कोई नया तर्क
विभागीय जांच में दोषी पाए जाने के बाद भी प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के तहत नगरीय प्रशासन संचालनालय द्वारा भूपेन्द्र सिंह को व्यक्तिगत सुनवाई का एक अंतिम मौका दिया गया था। इसके लिए 15 सितंबर 2025 को उन्हें भोपाल तलब किया गया। हालांकि, इस व्यक्तिगत सुनवाई के दौरान भी प्रभारी सीएमओ अपने बचाव में कोई भी नवीन तथ्य या पुख्ता दस्तावेज पेश करने में पूरी तरह असमर्थ रहे। उन्होंने केवल अपनी पुरानी दलीलों और कथनों को ही दोहराया, जिसे संचालनालय ने सिरे से खारिज कर दिया
कमिश्नर ने जारी किया कड़ा सजा का आदेश

अंततः, मामले से जुड़े सभी दस्तावेजों, साक्ष्यों और जांच अधिकारी की रिपोर्ट का सूक्ष्मता से परीक्षण करने के बाद नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग के कमिश्नर संकेत भोंडवे ने सजा का आदेश जारी कर दिया है। आदेश में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि भूपेन्द्र सिंह का यह कृत्य अपने पदीय कर्तव्यों के प्रति घोर लापरवाही, अनुशासनहीनता और राज्य शासन के प्रति संदिग्ध निष्ठा को दर्शाता है। इसके चलते मध्यप्रदेश नगरपालिका कर्मचारी (भर्ती तथा सेवा की शर्तें) नियम, 1968 के नियम 51 के तहत दंड स्वरूप उनकी आगामी 2 वेतनवृद्धियां संचयी प्रभाव से रोकने के आदेश देकर प्रकरण को बंद कर दिया गया है।


